सोमवार, 11 मार्च 2013


भारत के वर्तमान परिद्रीष्य मे सनातन सभ्यता की शैली ही बदल चुकी है और भारतियो को पता ही नही चला . सबसे पहले बालिवुड को हि ले ले . ये सन्स्था अश्लिलता और भौन्डापन की परिभाषा हि बदल दिया है . अभी जो गाना बन रहा है उसमे सुफियाना शैली का अन्दाज हि निराला है , पहले का म्युजिक मे शास्त्रियता का पुट होता था और वो गीत के सहारे बालिवुड आज भी जिन्दा है . ' रवीन्द्र जैन . आर डी बर्मन , कल्यान जी आनन्द जी युशु दास किशोर कुमार‌ इन सब का मेल एक अलग रोमान्च का अनुभव कराता था . भाषा समझ मे आये ना आये लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक मे इनके गाने युरोप और पुरे दक्षीण एशियाई देशो . तथा पाकिस्तान अफगान आदि देशो मे इनका ही प्रभाव था
अब जब इन्ही सुरमयी गीत सुन कर ये अरबी म्युजिक वाले आकर्षित हुए और बालीवुड की तरफ आये तो अपने साथ अपना कचरा भी साथ लाये. बालिवुड भी सेक्युलर‌ गरीब भुखमरे की तरह इनके कचरे का उपकार मानते हुए दोनो बाहे फैला कर आत्मसात भी कर लिया .
अब इनके गानो का शैली देखे .. इनके कोई भी गानो मे इनका अल्लाह पीछा ही नही छोड्ता प्रेमिका कि पप्पी वाला गीत बस इनको इनका अल्लाह माफ करे लगभग सभी गानो मे स्त्री जाति सिर्फ भोग की वस्तु है , बस उसको चुमने चाटने के  बाद अल्लाह माफ करे . पता नही इनके मोहम्मद ने क्या गलती किया . और उस गलती को बताये बिना अल्लाह इनको माफ करे एक गीत की हि बात नही है कैसे भी काम हो अल्लाह माफ करे .
ना जाने हमारे पुराने स्वर कहा गये जब होली, दिवाली . रक्षाबन्धन . सभी त्योहारो और मौसमो का सगीत  सुनते थे अब तो बस रन्डीबाजी गाना और अल्लाह माफ करे .

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