* भारत के सनातन संस्कृति का होता अरबीकरण और इसके पीछे की हिन्दुओ की उदासीनता *
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
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