सोमवार, 20 मई 2013

annaa roger
* यूरोप को रोमन अंक-प्रणाली(गणना करने की पद्धत) छोडकर हिन्दू संख्या-प्रणाली क्यों अपनानी पड़ी ?
आखिर यह "शुन्य" o को इतना महत्व क्यों दिया जाता है ? 
क्या रहस्य है इसका ?
पढो इसका उत्तर सरल भाषा में *
________________________________________

यूरोप में 13 वी शताब्दी तक लोगो को 0(शून्य) क्या होता है यह पता नही था. उस समय यूरोप में रोमन अंक पद्धत का चलन था (जिसमे I, II, III जैसे काडिया लगाकर क्रमांक लिखे जाते थे, क्युकी उन्होंने कोई लिपि या चिन्ह विकसित नही किये थे 0-9 तक के. 

यूरोप में गणना करने की रोमन पद्धत(जो सोलहवी शताब्दी तक लागू थी) - I, II, III, IV, V, VI, VII, VIII, IX, X.

इस रोमन पद्धत में 1 से 9 नौ के लिए काडिया(I, II, III) जोड़ दी गई थी, और पांच, दस के लिए कुछ चिन्ह(V, X) लगा दिए जाते थे. 

तो फिर इसमें समस्या कहाँ पर शुरू हुई ? कमिया क्या थी ?

इसमें समस्या ये थी की ये पद्धत बहुत ही सरल थी क्युकी जब गिनती 20 तक पहुंचती, तो उसे "दो बार दस" ऐसे लिखा जाता था ! 

10 को रोमन में लिखते है X. इसलिए 20 को जब लिखना होता था, तो लिखते थे XX.

अब इसमें समस्या तब बढने लगी जब गणना बड़ी हो जाती, जैसे की कोई समुद्र की लम्बाई हो, या ग्रहों की कोई गणना करनी हो, तो इसमें लिखने, जोड़ने, गुणाकार करने में ही घंटो लग जाते थे. इससे निपटने के लिए उन्होंने कुछ और चिन्ह जोड़ दिए.

जैसे की 50 को लिखने के लिए XXXXX की जगह L लिखो.
इसी तरह, 100 को LL लिखने की जगह C लिखो.
इसी तरह, 500 के लिए CCCCC के स्थान पर D लिखो.
और हजार के लिए M लिखो.

अब कुछ सरल उदाहरण लेते है, ताकि आपको यह पद्धत समझ आ जाए - 
1) 400 = CD (इसमें जब भी बाई और का अंक छोटा हो तो उसके दाई वाले अंक को उतना कम करना होता है. इसलिए CD का अर्थ हुआ D - C = 500 - 100 = 400. इस तरह 400 बन गया.
2) 300 = CCC
3) 1250 = MCCL

अब हमे पांच लक्ष लिखना है. कैसे लिखोगे ?
अब हमे पांच करोड़ लिखना है. कैसे लिखोगे ?

इन्हें लिखने पर बहुत सारे अंक हो जाते थे और पढ़ते समय बहुत समस्या होने लगी. इसका कारण यह था की "शुन्य" ना होने के कारण स्थानीय मूल्य(प्लेस-वेल्यू) की अवधारणा यूरोप की अंक-प्रणाली में नही थी. जो की भारतीय संख्या प्रणाली में शुरू से ही थी.

फिर हिन्दू गणना पद्धत यूरोप कैसे पहुंची ? और वेटिकन चर्च ने इसे क्यों नकार दिया ?

13 वी शताब्दी में जब अरबी लुटेरो ने उत्तर भारत के कुछ प्रान्तों पर अधिकार जमाया, तो अरबी व्यापारियों ने यूरोप जाकर भारत की संख्या-प्रणाली उन्हें बेच दी अपना नाम लगाकर. जब यूरोप के लोगो को इस प्रणाली का पता चला, तो वहां पर वेटिकन जो की एक प्रमुख भूमिका रखता था शाशन में, उसने कहा - "यह गणना करने की पद्धत एक शैतान(Devil) का तन्त्र है. हम इसको नही स्वीकार सकते."

और अगले 100 वर्षो तक जो भी यूरोप का वैज्ञानिक भारतीय गणना पद्धत, अंक-गणित के सिद्धांतो पर चलने का कार्य करता, उसको चर्च ढूंडकर ज्वाला में जिन्दा जला देती(मृत्युदंड). आपने गैलिलियो की कहानी तो सुनी ही होगी की कैसे उसको "पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है" कहने के लिए फांसी हो गई थी, चर्च द्वारा. अब इसमें कोई संदेह ना करे की गैलिलियो को यह ज्ञान भारत से ही मिला था, क्युकी यदि उसने यह स्वयं ढूंडा होता तो चर्च उसको कभी नही मारता. यही कारण है की पश्चिमी देशो में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जो चर्च का मजाक उड़ाते है क्युकी चर्च सदैव से ही पिछड़ी(BACKWARD) मानसिकता का रहा है. उसने कभी विज्ञानं को नही माना. 

जबकि भारत में धर्म और विज्ञानं, ज्ञान में कभी कोई लड़ाई नही रही. यह आजकल जो लड़ाई होती है भारतीय मीडिया में यह पश्चिमी शिक्षा का असर है जिसमे धर्म और विज्ञान दोनों को विरोधी समझा जाता है. यह एक यूरोपीय सोच है जो आजकल भारत में दिखाई देती है. इसलिए अगली बार आप किसी भी वामपंथी हिन्दू को वेदों का मजाक उड़ाते देखो तो उसको पूछो की "गैलिलियो को चर्च ने जिन्दा जला दिया यूरोप में, भारत में कभी किसी वैज्ञानिक, ऋषि को जिन्दा जलाया गया है विज्ञानं के शोध करने के लिए? यही नही, तो ऐसा क्यों ?" 

इसके बाद सोलहवी शताब्दी में धीरे धीरे वातावरण में परिवर्तन हुआ और यूरोप ने अपनी रोमन गणना-प्रणाली छोड़ भारतीय संख्या-प्रणाली अपना ली. जैसे-जैसे भारतीय अंक पहले मध्य पूर्व और फिर यूरोप में फैलने लगे, रोमन अंकों का प्रयोग केवल वर्गों-अध्यायों के नामों के लिए ही होने लगा और गणित में इनकी भूमिका ख़त्म हो गयी. (आज भी बहुत सी पुस्तको के अंत में इंडेक्स/अनुक्रमणिका में रोमन पद्धत से अंकित किये गये पन्ने आपको मिलेंगे. यह है भारत के गणित की शक्ति, की रोमन को इंडेक्स में घुसेड कर कर रख दिया. यदि यही पद्धत पूरी पुस्तक के पन्नो को अंकित/गिनने के लिए प्रयोग होती, तो पाठक को उस रोमन अंक का पहले अधिक-वजा कर उसका जोड़ निकालना पड़ता उस अंक को समझने के लिए.)

"भारत ने केवल 'शून्य' ही नही, पूरी संख्या-प्रणाली दी है अरबो को, यूरोप को. और यही प्रणाली आज पुरे विश्व में लागू है. भले ही इसे 'हिन्दू-अरबी' संख्या प्रणाली कहा जाता है परन्तु असल में इसमें अरबो का कोई योगदान नही है, क्युकी अरबो के आने से बहुत समय पहले ही सम्पूर्ण भारत में यह प्रणाली कार्यरत थी." - विलियम हाल्सी, 1983. 

और यह भी गौर करने वाली चीज है की सोलहवी शताब्दी के बाद ही यूरोप के गणित में अचानक से शोध लगना आरंभ हुए, जैसे की कोई गहरी निद्रा से जागा हो और आसमान से फोर्मुले गिरने लगे हो. स्पष्ट है की जब गिनना नही आता था, तो बहुत कुछ नही आता था. और गणित के सिद्धांत भी भारत से ही पहुंचे. भला कोई केवल "शुन्य" क्यों लेगा ? 
शुन्य के साथ बहुत कुछ माल दिखा होगा इनको, तभी तो स्वयं की ही रोमन पद्धती को लात मारकर सीधा हिन्दू गणना पद्धत अपना ली. क्युकी किसी भी सभ्यता में कोई इतना बड़ा बदलाव ऐसे ही नही करता, क्युकी रोमन अंक-प्रणाली को छोड़ने का अर्थ है यूरोप के हर मार्ग, हर इमारत पर भारतीय अंक-प्रणाली छापना. 

हमे भारतीय विद्यालयों में रोमन पद्धत तो सिखा देते है थोड़ी सी जानकारी के लिए, परन्तु इसका इतिहास नही बताते. "ज्ञान कैसे, और कहा फैला", यह भी बताना चाहिए स्कुलो में. 

विडियो और लिंक्स -
Ancient Hindu Technology 4 (Discovery of Zero)
http://en.wikipedia.org/wiki/Roman_numerals
http://en.wikipedia.org/wiki/Hindu-Arabic_numerals
हिंदी में कुछ पेजेस -
http://hi.wikipedia.org/wiki/रोमन_अंक
http://hi.wikipedia.org/wiki/आवर्त_सारणी
annaa roger
* यूरोप को रोमन अंक-प्रणाली(गणना करने की पद्धत) छोडकर हिन्दू संख्या-प्रणाली क्यों अपनानी पड़ी ?
आखिर यह "शुन्य" o को इतना महत्व क्यों दिया जाता है ? 
क्या रहस्य है इसका ?
पढो इसका उत्तर सरल भाषा में *
________________________________________

यूरोप में 13 वी शताब्दी तक लोगो को 0(शून्य) क्या होता है यह पता नही था. उस समय यूरोप में रोमन अंक पद्धत का चलन था (जिसमे I, II, III जैसे काडिया लगाकर क्रमांक लिखे जाते थे, क्युकी उन्होंने कोई लिपि या चिन्ह विकसित नही किये थे 0-9 तक के. 

यूरोप में गणना करने की रोमन पद्धत(जो सोलहवी शताब्दी तक लागू थी) - I, II, III, IV, V, VI, VII, VIII, IX, X.

इस रोमन पद्धत में 1 से 9 नौ के लिए काडिया(I, II, III) जोड़ दी गई थी, और पांच, दस के लिए कुछ चिन्ह(V, X) लगा दिए जाते थे. 

तो फिर इसमें समस्या कहाँ पर शुरू हुई ? कमिया क्या थी ?

इसमें समस्या ये थी की ये पद्धत बहुत ही सरल थी क्युकी जब गिनती 20 तक पहुंचती, तो उसे "दो बार दस" ऐसे लिखा जाता था ! 

10 को रोमन में लिखते है X. इसलिए 20 को जब लिखना होता था, तो लिखते थे XX.

अब इसमें समस्या तब बढने लगी जब गणना बड़ी हो जाती, जैसे की कोई समुद्र की लम्बाई हो, या ग्रहों की कोई गणना करनी हो, तो इसमें लिखने, जोड़ने, गुणाकार करने में ही घंटो लग जाते थे. इससे निपटने के लिए उन्होंने कुछ और चिन्ह जोड़ दिए.

जैसे की 50 को लिखने के लिए XXXXX की जगह L लिखो.
इसी तरह, 100 को LL लिखने की जगह C लिखो.
इसी तरह, 500 के लिए CCCCC के स्थान पर D लिखो.
और हजार के लिए M लिखो.

अब कुछ सरल उदाहरण लेते है, ताकि आपको यह पद्धत समझ आ जाए - 
1) 400 = CD (इसमें जब भी बाई और का अंक छोटा हो तो उसके दाई वाले अंक को उतना कम करना होता है. इसलिए CD का अर्थ हुआ D - C = 500 - 100 = 400. इस तरह 400 बन गया.
2) 300 = CCC
3) 1250 = MCCL

अब हमे पांच लक्ष लिखना है. कैसे लिखोगे ?
अब हमे पांच करोड़ लिखना है. कैसे लिखोगे ?

इन्हें लिखने पर बहुत सारे अंक हो जाते थे और पढ़ते समय बहुत समस्या होने लगी. इसका कारण यह था की "शुन्य" ना होने के कारण स्थानीय मूल्य(प्लेस-वेल्यू) की अवधारणा यूरोप की अंक-प्रणाली में नही थी. जो की भारतीय संख्या प्रणाली में शुरू से ही थी.

फिर हिन्दू गणना पद्धत यूरोप कैसे पहुंची ? और वेटिकन चर्च ने इसे क्यों नकार दिया ?

13 वी शताब्दी में जब अरबी लुटेरो ने उत्तर भारत के कुछ प्रान्तों पर अधिकार जमाया, तो अरबी व्यापारियों ने यूरोप जाकर भारत की संख्या-प्रणाली उन्हें बेच दी अपना नाम लगाकर. जब यूरोप के लोगो को इस प्रणाली का पता चला, तो वहां पर वेटिकन जो की एक प्रमुख भूमिका रखता था शाशन में, उसने कहा - "यह गणना करने की पद्धत एक शैतान(Devil) का तन्त्र है. हम इसको नही स्वीकार सकते."

और अगले 100 वर्षो तक जो भी यूरोप का वैज्ञानिक भारतीय गणना पद्धत, अंक-गणित के सिद्धांतो पर चलने का कार्य करता, उसको चर्च ढूंडकर ज्वाला में जिन्दा जला देती(मृत्युदंड). आपने गैलिलियो की कहानी तो सुनी ही होगी की कैसे उसको "पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है" कहने के लिए फांसी हो गई थी, चर्च द्वारा. अब इसमें कोई संदेह ना करे की गैलिलियो को यह ज्ञान भारत से ही मिला था, क्युकी यदि उसने यह स्वयं ढूंडा होता तो चर्च उसको कभी नही मारता. यही कारण है की पश्चिमी देशो में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जो चर्च का मजाक उड़ाते है क्युकी चर्च सदैव से ही पिछड़ी(BACKWARD) मानसिकता का रहा है. उसने कभी विज्ञानं को नही माना. 

जबकि भारत में धर्म और विज्ञानं, ज्ञान में कभी कोई लड़ाई नही रही. यह आजकल जो लड़ाई होती है भारतीय मीडिया में यह पश्चिमी शिक्षा का असर है जिसमे धर्म और विज्ञान दोनों को विरोधी समझा जाता है. यह एक यूरोपीय सोच है जो आजकल भारत में दिखाई देती है. इसलिए अगली बार आप किसी भी वामपंथी हिन्दू को वेदों का मजाक उड़ाते देखो तो उसको पूछो की "गैलिलियो को चर्च ने जिन्दा जला दिया यूरोप में, भारत में कभी किसी वैज्ञानिक, ऋषि को जिन्दा जलाया गया है विज्ञानं के शोध करने के लिए? यही नही, तो ऐसा क्यों ?" 

इसके बाद सोलहवी शताब्दी में धीरे धीरे वातावरण में परिवर्तन हुआ और यूरोप ने अपनी रोमन गणना-प्रणाली छोड़ भारतीय संख्या-प्रणाली अपना ली. जैसे-जैसे भारतीय अंक पहले मध्य पूर्व और फिर यूरोप में फैलने लगे, रोमन अंकों का प्रयोग केवल वर्गों-अध्यायों के नामों के लिए ही होने लगा और गणित में इनकी भूमिका ख़त्म हो गयी. (आज भी बहुत सी पुस्तको के अंत में इंडेक्स/अनुक्रमणिका में रोमन पद्धत से अंकित किये गये पन्ने आपको मिलेंगे. यह है भारत के गणित की शक्ति, की रोमन को इंडेक्स में घुसेड कर कर रख दिया. यदि यही पद्धत पूरी पुस्तक के पन्नो को अंकित/गिनने के लिए प्रयोग होती, तो पाठक को उस रोमन अंक का पहले अधिक-वजा कर उसका जोड़ निकालना पड़ता उस अंक को समझने के लिए.)

"भारत ने केवल 'शून्य' ही नही, पूरी संख्या-प्रणाली दी है अरबो को, यूरोप को. और यही प्रणाली आज पुरे विश्व में लागू है. भले ही इसे 'हिन्दू-अरबी' संख्या प्रणाली कहा जाता है परन्तु असल में इसमें अरबो का कोई योगदान नही है, क्युकी अरबो के आने से बहुत समय पहले ही सम्पूर्ण भारत में यह प्रणाली कार्यरत थी." - विलियम हाल्सी, 1983. 

और यह भी गौर करने वाली चीज है की सोलहवी शताब्दी के बाद ही यूरोप के गणित में अचानक से शोध लगना आरंभ हुए, जैसे की कोई गहरी निद्रा से जागा हो और आसमान से फोर्मुले गिरने लगे हो. स्पष्ट है की जब गिनना नही आता था, तो बहुत कुछ नही आता था. और गणित के सिद्धांत भी भारत से ही पहुंचे. भला कोई केवल "शुन्य" क्यों लेगा ? 
शुन्य के साथ बहुत कुछ माल दिखा होगा इनको, तभी तो स्वयं की ही रोमन पद्धती को लात मारकर सीधा हिन्दू गणना पद्धत अपना ली. क्युकी किसी भी सभ्यता में कोई इतना बड़ा बदलाव ऐसे ही नही करता, क्युकी रोमन अंक-प्रणाली को छोड़ने का अर्थ है यूरोप के हर मार्ग, हर इमारत पर भारतीय अंक-प्रणाली छापना. 

हमे भारतीय विद्यालयों में रोमन पद्धत तो सिखा देते है थोड़ी सी जानकारी के लिए, परन्तु इसका इतिहास नही बताते. "ज्ञान कैसे, और कहा फैला", यह भी बताना चाहिए स्कुलो में. 

विडियो और लिंक्स -
Ancient Hindu Technology 4 (Discovery of Zero)
http://en.wikipedia.org/wiki/Roman_numerals
http://en.wikipedia.org/wiki/Hindu-Arabic_numerals
हिंदी में कुछ पेजेस -
http://hi.wikipedia.org/wiki/रोमन_अंक
http://hi.wikipedia.org/wiki/आवर्त_सारणी