अवसरवाद ... भारत भुमी को तोड्ने के लिये जितने अवसर वादी १ हजार सालो से जुटे है शायद ही दुनिया के किसी और भाग मे मिलेन्गे पहले तो मुगलो ने मटिया मेट किया उसके बाद सन १९४७के बाद नेहरु और गान्धी ने किया , लेकिन दुख की बात है सारा दोष अन्ग्रेजो पर मढ दिया जाता है . उदाहरण देखे . यदी आप अपनी भारतिय सन्स्क्रिति कि सम्मान के लिये सन्स्क्रित भाषा को सविधान मे कुछ अधिकार देन्गे या हिन्दि को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये पहल करेन्गे या वन्दे मातरम गीत को गायेन्गे तो विरोध मे सबसे पहले कौन आयेगा ? दुसरा यदि आप बढती जनसन्ख्या को रोकने के लिये दो बच्चो वाली नीति बनाये तो पहला विरोध किसका होगा ? निसन्देह यहा के मुसलमान ही आयेन्गे . यहा के मुसलमानो को अपने देश से प्यार नही है उसे तो अरब देशो की गन्दगी चाटने कि आदत हो गइ है . अब यहा के हिन्दुत्व को तोडने के तरिके भी देख ले .. आर्य बाहर से आये है , यहा के एस सी और एस टी मुलनिवासि है . अब इन सालो को जिसमे नेहरु भी है . विग्यान को नहि मानता और सनातन धर्म को भी नही मानता . विग्यान कहता है कि समस्त प्राणीयो का मुल निवास आफ्रिका महाद्विप है यहा से समस्त प्राणिया जिसमे मनुष्य भी है सभी महाद्विपो मे फैले है . सनातन धर्म कहता है कि सन्सार के सभी प्राणियो का मुल जन्म स्थान हिमालय का क्षेत्र है यहि से सभ्यता का विकास होते कालान्तर मे सभी जगह फैल गये अब उपरोक्त दोनो मे से कोइ भी बात को माने तो बाहरी और मुल निवासी का झगडा ही समाप्त समझो . लेकिन नही अवसरवादियो को अपनी रोजी रोटी चलाने के लिये मुर्खो को मुर्ख बनाने मे ही अपनि बरकत नजर आती है . अब अवसर वाद का दुसरा उदाहरण देखिये .. जाती वाद .. जवाहर लाल नेहरु के साथ उस समय जितने भी अवसरवादी राजनितिग्य थे वो सभी इस्लामी गन्दगी से सराबोर थे उन सब को मोहम्मद के गन्दगी भारत मे फैलाने फैलाने मे अपनी विकास नजर आयी या यु कहे कि वो मुगलो का एजेन्ट ही था जिसने यहा के सभ्यता को छिन्न भिन्न करके इस्लाम वाद का जहर फैलाये . अब इनके फैलाये जहर मे यहा के भारतिय इस कदर उलझे कि आज तक वो अपनो से ही निपटने मे सारी उर्जा नष्ट कर रहे है . कोइ अपने को ब्र्हामण मान कर छुत फैला रहा तो कोइ अपने को महाराणा प्रताप का औलाद मान कर अपने को शुरवीर समझकर असली दुश्मन इस्लाम से अपनी सिर छुपाये अपने ही छोटे भाइयो से आरक्षण नाम पर लडाइ लड रहा है .
रविवार, 31 मार्च 2013
सोमवार, 11 मार्च 2013
भारत के वर्तमान परिद्रीष्य मे सनातन सभ्यता की शैली ही बदल चुकी है और भारतियो को पता ही नही चला . सबसे पहले बालिवुड को हि ले ले . ये सन्स्था अश्लिलता और भौन्डापन की परिभाषा हि बदल दिया है . अभी जो गाना बन रहा है उसमे सुफियाना शैली का अन्दाज हि निराला है , पहले का म्युजिक मे शास्त्रियता का पुट होता था और वो गीत के सहारे बालिवुड आज भी जिन्दा है . ' रवीन्द्र जैन . आर डी बर्मन , कल्यान जी आनन्द जी युशु दास किशोर कुमार इन सब का मेल एक अलग रोमान्च का अनुभव कराता था . भाषा समझ मे आये ना आये लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक मे इनके गाने युरोप और पुरे दक्षीण एशियाई देशो . तथा पाकिस्तान अफगान आदि देशो मे इनका ही प्रभाव था
अब जब इन्ही सुरमयी गीत सुन कर ये अरबी म्युजिक वाले आकर्षित हुए और बालीवुड की तरफ आये तो अपने साथ अपना कचरा भी साथ लाये. बालिवुड भी सेक्युलर गरीब भुखमरे की तरह इनके कचरे का उपकार मानते हुए दोनो बाहे फैला कर आत्मसात भी कर लिया .
अब इनके गानो का शैली देखे .. इनके कोई भी गानो मे इनका अल्लाह पीछा ही नही छोड्ता प्रेमिका कि पप्पी वाला गीत बस इनको इनका अल्लाह माफ करे लगभग सभी गानो मे स्त्री जाति सिर्फ भोग की वस्तु है , बस उसको चुमने चाटने के बाद अल्लाह माफ करे . पता नही इनके मोहम्मद ने क्या गलती किया . और उस गलती को बताये बिना अल्लाह इनको माफ करे एक गीत की हि बात नही है कैसे भी काम हो अल्लाह माफ करे .
ना जाने हमारे पुराने स्वर कहा गये जब होली, दिवाली . रक्षाबन्धन . सभी त्योहारो और मौसमो का सगीत सुनते थे अब तो बस रन्डीबाजी गाना और अल्लाह माफ करे .
रविवार, 10 मार्च 2013
* भारत के सनातन संस्कृति का होता अरबीकरण और इसके पीछे की हिन्दुओ की उदासीनता *
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
* भारत के सनातन संस्कृति का होता अरबीकरण और इसके पीछे की हिन्दुओ की उदासीनता *
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
* भारत के सनातन संस्कृति का होता अरबीकरण और इसके पीछे की हिन्दुओ की उदासीनता *
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.
गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.
अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"
ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.
फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?
पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".
अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
* सनातन धर्म, इस्लाम, सनातन नारी और बलात्कार *
annaa roger ... उग्र विचारक
हमारी संस्कृति विचारो की शुद्धता, आत्मा पर महत्व देती है, कपड़ो पर नहीं. सनातन संस्कृति में पुरुष नारी समान है. यह इस्लामियो ने गंदगी भर दी है.
स्त्री पर किसीका अधिकार नहीं होता. हर कोई स्वतंत्र है. यह किसको क्या पहनना है की भांडूगिरी इस्लामी मुल्लो से सीखी हिन्दू धर्म के बाबाओ ने. फतवा देने की परम्परा आ गई वही से हिन्दुओ में भी.
तुम्हारी बहन के शरीर पर तुम्हारा अधिकार नही है. उसको क्या परिधान पहनने है वो तुम्हे नही पूछेगी. यह उसका अधिकार है, उसका शरीर है, तुम्हारी सम्पत्ति नही.
यही कारण है की भारत में बलात्कार जैसी चीजे ना के बराबर थी. क्युकी सुख पाने के लिए लोग ज्ञान, खेल, साहित्य का सहारा लेते थे. स्त्री के शरीर को खिलौना समझकर उसको नही नोचते थे. बोलीवुड की विचारधारा इस्लामी है. सारा का सारा जीवन का पुरुषार्थ एक लड़की के शरीर को कैसे प्राप्त करना है इसपर है. अब यही आपके जीवन का महान उद्देश्य बन गया है – लौंडीगिरी.
एक बार संस्कृत में लिखी गई महाभारत पढ़ लो. उसमे तुम्हे चोली और निचे की छोटी से धोती के अतिरिक्त कुछ नही मिलेगा. वो टीवी वालो ने बड़े बड़े कपडे लड़ दिए है. उसमे तो कंधे, स्तन के उपर का नग भी खुला होता था(जिसे यूरोप में चोली पहनते है अज के युग में, बिलकुल वैसे ही. अंतर केवल “कपड़े” के प्रकार का है.)
"सभ्यता" आप क्या पहनते हो उसमे नहीं है. क्या "सोचते" हो, उसमे है. मोहम्मद की सोच गंदी, वासना से भरी थी नारियो के लिए, इस कारण उसने यह सोचा की हर कोई व्यक्ति उसके जैसा ही सोचत है. और इसी कारण उसने कहा - "नारियो को आँखे छोडकर बाकी बदन ढक के रखना चाहिए, यही अच्छी नारी के गुण है"
असल में उसकी सोच यह थी की यदि नारी पूरा बदन नही ढके तो उसका बलात्कार कर देंगे लोग. लोगो की मानसिकता बदलने की जगह उसको नारियो पर बंधन लादने में रूचि थी. इसी ही नकारात्मक विचारधारा से भरा पड़ा है इस्लाम. और इसी कारण जापान, कोरिया ने इस्लाम को “मानसिक रुग्ण की उपज” बताकर प्रतिबंधित कर दिया. जपानी कोई पागल नहीं है की ऐसे ही किसी धर्म को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने प्रतिबन्ध लगाये. यह बहुत अध्ययन के बाद कही गई बात है. भारत में लोग इतने डरपोक, अन्ध-विश्वासी, फट्टू, कमजोर-बुद्धी(हजार वर्ष के इस्लामी-गुलामी में हुए बौद्धिक, शारीरिक, आत्मबल के पतन कर कारण) है की कोई भी बाबा, प्रोफेट आ जाये उसकी बातो को धर्म मान लेते है. जो मूल-पुस्तक है स्वयं के और दुसरे धर्मो की, उनको पढकर कभी अध्ययन नहीं करते की उसकी असलियत, तथ्य क्या है और स्वयं के व् दुसरे धर्मो के कितना बड़ा विरोधाभास है. वह मूर्ख “सब धर्म समान है” कह देते है बिना कुछ पढ़े ही दुसरो की प्रभाव में आकर और डर के कारण.
annaa roger ... उग्र विचारक
हमारी संस्कृति विचारो की शुद्धता, आत्मा पर महत्व देती है, कपड़ो पर नहीं. सनातन संस्कृति में पुरुष नारी समान है. यह इस्लामियो ने गंदगी भर दी है.
स्त्री पर किसीका अधिकार नहीं होता. हर कोई स्वतंत्र है. यह किसको क्या पहनना है की भांडूगिरी इस्लामी मुल्लो से सीखी हिन्दू धर्म के बाबाओ ने. फतवा देने की परम्परा आ गई वही से हिन्दुओ में भी.
तुम्हारी बहन के शरीर पर तुम्हारा अधिकार नही है. उसको क्या परिधान पहनने है वो तुम्हे नही पूछेगी. यह उसका अधिकार है, उसका शरीर है, तुम्हारी सम्पत्ति नही.
यही कारण है की भारत में बलात्कार जैसी चीजे ना के बराबर थी. क्युकी सुख पाने के लिए लोग ज्ञान, खेल, साहित्य का सहारा लेते थे. स्त्री के शरीर को खिलौना समझकर उसको नही नोचते थे. बोलीवुड की विचारधारा इस्लामी है. सारा का सारा जीवन का पुरुषार्थ एक लड़की के शरीर को कैसे प्राप्त करना है इसपर है. अब यही आपके जीवन का महान उद्देश्य बन गया है – लौंडीगिरी.
एक बार संस्कृत में लिखी गई महाभारत पढ़ लो. उसमे तुम्हे चोली और निचे की छोटी से धोती के अतिरिक्त कुछ नही मिलेगा. वो टीवी वालो ने बड़े बड़े कपडे लड़ दिए है. उसमे तो कंधे, स्तन के उपर का नग भी खुला होता था(जिसे यूरोप में चोली पहनते है अज के युग में, बिलकुल वैसे ही. अंतर केवल “कपड़े” के प्रकार का है.)
"सभ्यता" आप क्या पहनते हो उसमे नहीं है. क्या "सोचते" हो, उसमे है. मोहम्मद की सोच गंदी, वासना से भरी थी नारियो के लिए, इस कारण उसने यह सोचा की हर कोई व्यक्ति उसके जैसा ही सोचत है. और इसी कारण उसने कहा - "नारियो को आँखे छोडकर बाकी बदन ढक के रखना चाहिए, यही अच्छी नारी के गुण है"
असल में उसकी सोच यह थी की यदि नारी पूरा बदन नही ढके तो उसका बलात्कार कर देंगे लोग. लोगो की मानसिकता बदलने की जगह उसको नारियो पर बंधन लादने में रूचि थी. इसी ही नकारात्मक विचारधारा से भरा पड़ा है इस्लाम. और इसी कारण जापान, कोरिया ने इस्लाम को “मानसिक रुग्ण की उपज” बताकर प्रतिबंधित कर दिया. जपानी कोई पागल नहीं है की ऐसे ही किसी धर्म को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने प्रतिबन्ध लगाये. यह बहुत अध्ययन के बाद कही गई बात है. भारत में लोग इतने डरपोक, अन्ध-विश्वासी, फट्टू, कमजोर-बुद्धी(हजार वर्ष के इस्लामी-गुलामी में हुए बौद्धिक, शारीरिक, आत्मबल के पतन कर कारण) है की कोई भी बाबा, प्रोफेट आ जाये उसकी बातो को धर्म मान लेते है. जो मूल-पुस्तक है स्वयं के और दुसरे धर्मो की, उनको पढकर कभी अध्ययन नहीं करते की उसकी असलियत, तथ्य क्या है और स्वयं के व् दुसरे धर्मो के कितना बड़ा विरोधाभास है. वह मूर्ख “सब धर्म समान है” कह देते है बिना कुछ पढ़े ही दुसरो की प्रभाव में आकर और डर के कारण.
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