रविवार, 10 मार्च 2013

* सनातन धर्म, इस्लाम, सनातन नारी और बलात्कार *
annaa roger ... उग्र विचारक‌

हमारी संस्कृति विचारो की शुद्धता, आत्मा पर महत्व देती है, कपड़ो पर नहीं. सनातन संस्कृति में पुरुष नारी समान है. यह इस्लामियो ने गंदगी भर दी है. 
स्त्री पर किसीका अधिकार नहीं होता. हर कोई स्वतंत्र है. यह किसको क्या पहनना है की भांडूगिरी इस्लामी मुल्लो से सीखी हिन्दू धर्म के बाबाओ ने. फतवा देने की परम्परा आ गई वही से हिन्दुओ में भी. 
तुम्हारी बहन के शरीर पर तुम्हारा अधिकार नही है. उसको क्या परिधान पहनने है वो तुम्हे नही पूछेगी. यह उसका अधिकार है, उसका शरीर है, तुम्हारी सम्पत्ति नही.
यही कारण है की भारत में बलात्कार जैसी चीजे ना के बराबर थी. क्युकी सुख पाने के लिए लोग ज्ञान, खेल, साहित्य का सहारा लेते थे. स्त्री के शरीर को खिलौना समझकर उसको नही नोचते थे. बोलीवुड की विचारधारा इस्लामी है. सारा का सारा जीवन का पुरुषार्थ एक लड़की के शरीर को कैसे प्राप्त करना है इसपर है. अब यही आपके जीवन का महान उद्देश्य बन गया है – लौंडीगिरी.
एक बार संस्कृत में लिखी गई महाभारत पढ़ लो. उसमे तुम्हे चोली और निचे की छोटी से धोती के अतिरिक्त कुछ नही मिलेगा. वो टीवी वालो ने बड़े बड़े कपडे लड़ दिए है. उसमे तो कंधे, स्तन के उपर का नग भी खुला होता था(जिसे यूरोप में चोली पहनते है अज के युग में, बिलकुल वैसे ही. अंतर केवल “कपड़े” के प्रकार का है.)
"सभ्यता" आप क्या पहनते हो उसमे नहीं है. क्या "सोचते" हो, उसमे है. मोहम्मद की सोच गंदी, वासना से भरी थी नारियो के लिए, इस कारण उसने यह सोचा की हर कोई व्यक्ति उसके जैसा ही सोचत है. और इसी कारण उसने कहा - "नारियो को आँखे छोडकर बाकी बदन ढक के रखना चाहिए, यही अच्छी नारी के गुण है" 

असल में उसकी सोच यह थी की यदि नारी पूरा बदन नही ढके तो उसका बलात्कार कर देंगे लोग. लोगो की मानसिकता बदलने की जगह उसको नारियो पर बंधन लादने में रूचि थी. इसी ही नकारात्मक विचारधारा से भरा पड़ा है इस्लाम. और इसी कारण जापान, कोरिया ने इस्लाम को “मानसिक रुग्ण की उपज” बताकर प्रतिबंधित कर दिया. जपानी कोई पागल नहीं है की ऐसे ही किसी धर्म को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने प्रतिबन्ध लगाये. यह बहुत अध्ययन के बाद कही गई बात है. भारत में लोग इतने डरपोक, अन्ध-विश्वासी, फट्टू, कमजोर-बुद्धी(हजार वर्ष के इस्लामी-गुलामी में हुए बौद्धिक, शारीरिक, आत्मबल के पतन कर कारण) है की कोई भी बाबा, प्रोफेट आ जाये उसकी बातो को धर्म मान लेते है. जो मूल-पुस्तक है स्वयं के और दुसरे धर्मो की, उनको पढकर कभी अध्ययन नहीं करते की उसकी असलियत, तथ्य क्या है और स्वयं के व् दुसरे धर्मो के कितना बड़ा विरोधाभास है. वह मूर्ख “सब धर्म समान है” कह देते है बिना कुछ पढ़े ही दुसरो की प्रभाव में आकर और डर के कारण.

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