सोमवार, 20 मई 2013

annaa roger
* यूरोप को रोमन अंक-प्रणाली(गणना करने की पद्धत) छोडकर हिन्दू संख्या-प्रणाली क्यों अपनानी पड़ी ?
आखिर यह "शुन्य" o को इतना महत्व क्यों दिया जाता है ? 
क्या रहस्य है इसका ?
पढो इसका उत्तर सरल भाषा में *
________________________________________

यूरोप में 13 वी शताब्दी तक लोगो को 0(शून्य) क्या होता है यह पता नही था. उस समय यूरोप में रोमन अंक पद्धत का चलन था (जिसमे I, II, III जैसे काडिया लगाकर क्रमांक लिखे जाते थे, क्युकी उन्होंने कोई लिपि या चिन्ह विकसित नही किये थे 0-9 तक के. 

यूरोप में गणना करने की रोमन पद्धत(जो सोलहवी शताब्दी तक लागू थी) - I, II, III, IV, V, VI, VII, VIII, IX, X.

इस रोमन पद्धत में 1 से 9 नौ के लिए काडिया(I, II, III) जोड़ दी गई थी, और पांच, दस के लिए कुछ चिन्ह(V, X) लगा दिए जाते थे. 

तो फिर इसमें समस्या कहाँ पर शुरू हुई ? कमिया क्या थी ?

इसमें समस्या ये थी की ये पद्धत बहुत ही सरल थी क्युकी जब गिनती 20 तक पहुंचती, तो उसे "दो बार दस" ऐसे लिखा जाता था ! 

10 को रोमन में लिखते है X. इसलिए 20 को जब लिखना होता था, तो लिखते थे XX.

अब इसमें समस्या तब बढने लगी जब गणना बड़ी हो जाती, जैसे की कोई समुद्र की लम्बाई हो, या ग्रहों की कोई गणना करनी हो, तो इसमें लिखने, जोड़ने, गुणाकार करने में ही घंटो लग जाते थे. इससे निपटने के लिए उन्होंने कुछ और चिन्ह जोड़ दिए.

जैसे की 50 को लिखने के लिए XXXXX की जगह L लिखो.
इसी तरह, 100 को LL लिखने की जगह C लिखो.
इसी तरह, 500 के लिए CCCCC के स्थान पर D लिखो.
और हजार के लिए M लिखो.

अब कुछ सरल उदाहरण लेते है, ताकि आपको यह पद्धत समझ आ जाए - 
1) 400 = CD (इसमें जब भी बाई और का अंक छोटा हो तो उसके दाई वाले अंक को उतना कम करना होता है. इसलिए CD का अर्थ हुआ D - C = 500 - 100 = 400. इस तरह 400 बन गया.
2) 300 = CCC
3) 1250 = MCCL

अब हमे पांच लक्ष लिखना है. कैसे लिखोगे ?
अब हमे पांच करोड़ लिखना है. कैसे लिखोगे ?

इन्हें लिखने पर बहुत सारे अंक हो जाते थे और पढ़ते समय बहुत समस्या होने लगी. इसका कारण यह था की "शुन्य" ना होने के कारण स्थानीय मूल्य(प्लेस-वेल्यू) की अवधारणा यूरोप की अंक-प्रणाली में नही थी. जो की भारतीय संख्या प्रणाली में शुरू से ही थी.

फिर हिन्दू गणना पद्धत यूरोप कैसे पहुंची ? और वेटिकन चर्च ने इसे क्यों नकार दिया ?

13 वी शताब्दी में जब अरबी लुटेरो ने उत्तर भारत के कुछ प्रान्तों पर अधिकार जमाया, तो अरबी व्यापारियों ने यूरोप जाकर भारत की संख्या-प्रणाली उन्हें बेच दी अपना नाम लगाकर. जब यूरोप के लोगो को इस प्रणाली का पता चला, तो वहां पर वेटिकन जो की एक प्रमुख भूमिका रखता था शाशन में, उसने कहा - "यह गणना करने की पद्धत एक शैतान(Devil) का तन्त्र है. हम इसको नही स्वीकार सकते."

और अगले 100 वर्षो तक जो भी यूरोप का वैज्ञानिक भारतीय गणना पद्धत, अंक-गणित के सिद्धांतो पर चलने का कार्य करता, उसको चर्च ढूंडकर ज्वाला में जिन्दा जला देती(मृत्युदंड). आपने गैलिलियो की कहानी तो सुनी ही होगी की कैसे उसको "पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है" कहने के लिए फांसी हो गई थी, चर्च द्वारा. अब इसमें कोई संदेह ना करे की गैलिलियो को यह ज्ञान भारत से ही मिला था, क्युकी यदि उसने यह स्वयं ढूंडा होता तो चर्च उसको कभी नही मारता. यही कारण है की पश्चिमी देशो में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जो चर्च का मजाक उड़ाते है क्युकी चर्च सदैव से ही पिछड़ी(BACKWARD) मानसिकता का रहा है. उसने कभी विज्ञानं को नही माना. 

जबकि भारत में धर्म और विज्ञानं, ज्ञान में कभी कोई लड़ाई नही रही. यह आजकल जो लड़ाई होती है भारतीय मीडिया में यह पश्चिमी शिक्षा का असर है जिसमे धर्म और विज्ञान दोनों को विरोधी समझा जाता है. यह एक यूरोपीय सोच है जो आजकल भारत में दिखाई देती है. इसलिए अगली बार आप किसी भी वामपंथी हिन्दू को वेदों का मजाक उड़ाते देखो तो उसको पूछो की "गैलिलियो को चर्च ने जिन्दा जला दिया यूरोप में, भारत में कभी किसी वैज्ञानिक, ऋषि को जिन्दा जलाया गया है विज्ञानं के शोध करने के लिए? यही नही, तो ऐसा क्यों ?" 

इसके बाद सोलहवी शताब्दी में धीरे धीरे वातावरण में परिवर्तन हुआ और यूरोप ने अपनी रोमन गणना-प्रणाली छोड़ भारतीय संख्या-प्रणाली अपना ली. जैसे-जैसे भारतीय अंक पहले मध्य पूर्व और फिर यूरोप में फैलने लगे, रोमन अंकों का प्रयोग केवल वर्गों-अध्यायों के नामों के लिए ही होने लगा और गणित में इनकी भूमिका ख़त्म हो गयी. (आज भी बहुत सी पुस्तको के अंत में इंडेक्स/अनुक्रमणिका में रोमन पद्धत से अंकित किये गये पन्ने आपको मिलेंगे. यह है भारत के गणित की शक्ति, की रोमन को इंडेक्स में घुसेड कर कर रख दिया. यदि यही पद्धत पूरी पुस्तक के पन्नो को अंकित/गिनने के लिए प्रयोग होती, तो पाठक को उस रोमन अंक का पहले अधिक-वजा कर उसका जोड़ निकालना पड़ता उस अंक को समझने के लिए.)

"भारत ने केवल 'शून्य' ही नही, पूरी संख्या-प्रणाली दी है अरबो को, यूरोप को. और यही प्रणाली आज पुरे विश्व में लागू है. भले ही इसे 'हिन्दू-अरबी' संख्या प्रणाली कहा जाता है परन्तु असल में इसमें अरबो का कोई योगदान नही है, क्युकी अरबो के आने से बहुत समय पहले ही सम्पूर्ण भारत में यह प्रणाली कार्यरत थी." - विलियम हाल्सी, 1983. 

और यह भी गौर करने वाली चीज है की सोलहवी शताब्दी के बाद ही यूरोप के गणित में अचानक से शोध लगना आरंभ हुए, जैसे की कोई गहरी निद्रा से जागा हो और आसमान से फोर्मुले गिरने लगे हो. स्पष्ट है की जब गिनना नही आता था, तो बहुत कुछ नही आता था. और गणित के सिद्धांत भी भारत से ही पहुंचे. भला कोई केवल "शुन्य" क्यों लेगा ? 
शुन्य के साथ बहुत कुछ माल दिखा होगा इनको, तभी तो स्वयं की ही रोमन पद्धती को लात मारकर सीधा हिन्दू गणना पद्धत अपना ली. क्युकी किसी भी सभ्यता में कोई इतना बड़ा बदलाव ऐसे ही नही करता, क्युकी रोमन अंक-प्रणाली को छोड़ने का अर्थ है यूरोप के हर मार्ग, हर इमारत पर भारतीय अंक-प्रणाली छापना. 

हमे भारतीय विद्यालयों में रोमन पद्धत तो सिखा देते है थोड़ी सी जानकारी के लिए, परन्तु इसका इतिहास नही बताते. "ज्ञान कैसे, और कहा फैला", यह भी बताना चाहिए स्कुलो में. 

विडियो और लिंक्स -
Ancient Hindu Technology 4 (Discovery of Zero)
http://en.wikipedia.org/wiki/Roman_numerals
http://en.wikipedia.org/wiki/Hindu-Arabic_numerals
हिंदी में कुछ पेजेस -
http://hi.wikipedia.org/wiki/रोमन_अंक
http://hi.wikipedia.org/wiki/आवर्त_सारणी
annaa roger
* यूरोप को रोमन अंक-प्रणाली(गणना करने की पद्धत) छोडकर हिन्दू संख्या-प्रणाली क्यों अपनानी पड़ी ?
आखिर यह "शुन्य" o को इतना महत्व क्यों दिया जाता है ? 
क्या रहस्य है इसका ?
पढो इसका उत्तर सरल भाषा में *
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यूरोप में 13 वी शताब्दी तक लोगो को 0(शून्य) क्या होता है यह पता नही था. उस समय यूरोप में रोमन अंक पद्धत का चलन था (जिसमे I, II, III जैसे काडिया लगाकर क्रमांक लिखे जाते थे, क्युकी उन्होंने कोई लिपि या चिन्ह विकसित नही किये थे 0-9 तक के. 

यूरोप में गणना करने की रोमन पद्धत(जो सोलहवी शताब्दी तक लागू थी) - I, II, III, IV, V, VI, VII, VIII, IX, X.

इस रोमन पद्धत में 1 से 9 नौ के लिए काडिया(I, II, III) जोड़ दी गई थी, और पांच, दस के लिए कुछ चिन्ह(V, X) लगा दिए जाते थे. 

तो फिर इसमें समस्या कहाँ पर शुरू हुई ? कमिया क्या थी ?

इसमें समस्या ये थी की ये पद्धत बहुत ही सरल थी क्युकी जब गिनती 20 तक पहुंचती, तो उसे "दो बार दस" ऐसे लिखा जाता था ! 

10 को रोमन में लिखते है X. इसलिए 20 को जब लिखना होता था, तो लिखते थे XX.

अब इसमें समस्या तब बढने लगी जब गणना बड़ी हो जाती, जैसे की कोई समुद्र की लम्बाई हो, या ग्रहों की कोई गणना करनी हो, तो इसमें लिखने, जोड़ने, गुणाकार करने में ही घंटो लग जाते थे. इससे निपटने के लिए उन्होंने कुछ और चिन्ह जोड़ दिए.

जैसे की 50 को लिखने के लिए XXXXX की जगह L लिखो.
इसी तरह, 100 को LL लिखने की जगह C लिखो.
इसी तरह, 500 के लिए CCCCC के स्थान पर D लिखो.
और हजार के लिए M लिखो.

अब कुछ सरल उदाहरण लेते है, ताकि आपको यह पद्धत समझ आ जाए - 
1) 400 = CD (इसमें जब भी बाई और का अंक छोटा हो तो उसके दाई वाले अंक को उतना कम करना होता है. इसलिए CD का अर्थ हुआ D - C = 500 - 100 = 400. इस तरह 400 बन गया.
2) 300 = CCC
3) 1250 = MCCL

अब हमे पांच लक्ष लिखना है. कैसे लिखोगे ?
अब हमे पांच करोड़ लिखना है. कैसे लिखोगे ?

इन्हें लिखने पर बहुत सारे अंक हो जाते थे और पढ़ते समय बहुत समस्या होने लगी. इसका कारण यह था की "शुन्य" ना होने के कारण स्थानीय मूल्य(प्लेस-वेल्यू) की अवधारणा यूरोप की अंक-प्रणाली में नही थी. जो की भारतीय संख्या प्रणाली में शुरू से ही थी.

फिर हिन्दू गणना पद्धत यूरोप कैसे पहुंची ? और वेटिकन चर्च ने इसे क्यों नकार दिया ?

13 वी शताब्दी में जब अरबी लुटेरो ने उत्तर भारत के कुछ प्रान्तों पर अधिकार जमाया, तो अरबी व्यापारियों ने यूरोप जाकर भारत की संख्या-प्रणाली उन्हें बेच दी अपना नाम लगाकर. जब यूरोप के लोगो को इस प्रणाली का पता चला, तो वहां पर वेटिकन जो की एक प्रमुख भूमिका रखता था शाशन में, उसने कहा - "यह गणना करने की पद्धत एक शैतान(Devil) का तन्त्र है. हम इसको नही स्वीकार सकते."

और अगले 100 वर्षो तक जो भी यूरोप का वैज्ञानिक भारतीय गणना पद्धत, अंक-गणित के सिद्धांतो पर चलने का कार्य करता, उसको चर्च ढूंडकर ज्वाला में जिन्दा जला देती(मृत्युदंड). आपने गैलिलियो की कहानी तो सुनी ही होगी की कैसे उसको "पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है" कहने के लिए फांसी हो गई थी, चर्च द्वारा. अब इसमें कोई संदेह ना करे की गैलिलियो को यह ज्ञान भारत से ही मिला था, क्युकी यदि उसने यह स्वयं ढूंडा होता तो चर्च उसको कभी नही मारता. यही कारण है की पश्चिमी देशो में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जो चर्च का मजाक उड़ाते है क्युकी चर्च सदैव से ही पिछड़ी(BACKWARD) मानसिकता का रहा है. उसने कभी विज्ञानं को नही माना. 

जबकि भारत में धर्म और विज्ञानं, ज्ञान में कभी कोई लड़ाई नही रही. यह आजकल जो लड़ाई होती है भारतीय मीडिया में यह पश्चिमी शिक्षा का असर है जिसमे धर्म और विज्ञान दोनों को विरोधी समझा जाता है. यह एक यूरोपीय सोच है जो आजकल भारत में दिखाई देती है. इसलिए अगली बार आप किसी भी वामपंथी हिन्दू को वेदों का मजाक उड़ाते देखो तो उसको पूछो की "गैलिलियो को चर्च ने जिन्दा जला दिया यूरोप में, भारत में कभी किसी वैज्ञानिक, ऋषि को जिन्दा जलाया गया है विज्ञानं के शोध करने के लिए? यही नही, तो ऐसा क्यों ?" 

इसके बाद सोलहवी शताब्दी में धीरे धीरे वातावरण में परिवर्तन हुआ और यूरोप ने अपनी रोमन गणना-प्रणाली छोड़ भारतीय संख्या-प्रणाली अपना ली. जैसे-जैसे भारतीय अंक पहले मध्य पूर्व और फिर यूरोप में फैलने लगे, रोमन अंकों का प्रयोग केवल वर्गों-अध्यायों के नामों के लिए ही होने लगा और गणित में इनकी भूमिका ख़त्म हो गयी. (आज भी बहुत सी पुस्तको के अंत में इंडेक्स/अनुक्रमणिका में रोमन पद्धत से अंकित किये गये पन्ने आपको मिलेंगे. यह है भारत के गणित की शक्ति, की रोमन को इंडेक्स में घुसेड कर कर रख दिया. यदि यही पद्धत पूरी पुस्तक के पन्नो को अंकित/गिनने के लिए प्रयोग होती, तो पाठक को उस रोमन अंक का पहले अधिक-वजा कर उसका जोड़ निकालना पड़ता उस अंक को समझने के लिए.)

"भारत ने केवल 'शून्य' ही नही, पूरी संख्या-प्रणाली दी है अरबो को, यूरोप को. और यही प्रणाली आज पुरे विश्व में लागू है. भले ही इसे 'हिन्दू-अरबी' संख्या प्रणाली कहा जाता है परन्तु असल में इसमें अरबो का कोई योगदान नही है, क्युकी अरबो के आने से बहुत समय पहले ही सम्पूर्ण भारत में यह प्रणाली कार्यरत थी." - विलियम हाल्सी, 1983. 

और यह भी गौर करने वाली चीज है की सोलहवी शताब्दी के बाद ही यूरोप के गणित में अचानक से शोध लगना आरंभ हुए, जैसे की कोई गहरी निद्रा से जागा हो और आसमान से फोर्मुले गिरने लगे हो. स्पष्ट है की जब गिनना नही आता था, तो बहुत कुछ नही आता था. और गणित के सिद्धांत भी भारत से ही पहुंचे. भला कोई केवल "शुन्य" क्यों लेगा ? 
शुन्य के साथ बहुत कुछ माल दिखा होगा इनको, तभी तो स्वयं की ही रोमन पद्धती को लात मारकर सीधा हिन्दू गणना पद्धत अपना ली. क्युकी किसी भी सभ्यता में कोई इतना बड़ा बदलाव ऐसे ही नही करता, क्युकी रोमन अंक-प्रणाली को छोड़ने का अर्थ है यूरोप के हर मार्ग, हर इमारत पर भारतीय अंक-प्रणाली छापना. 

हमे भारतीय विद्यालयों में रोमन पद्धत तो सिखा देते है थोड़ी सी जानकारी के लिए, परन्तु इसका इतिहास नही बताते. "ज्ञान कैसे, और कहा फैला", यह भी बताना चाहिए स्कुलो में. 

विडियो और लिंक्स -
Ancient Hindu Technology 4 (Discovery of Zero)
http://en.wikipedia.org/wiki/Roman_numerals
http://en.wikipedia.org/wiki/Hindu-Arabic_numerals
हिंदी में कुछ पेजेस -
http://hi.wikipedia.org/wiki/रोमन_अंक
http://hi.wikipedia.org/wiki/आवर्त_सारणी

रविवार, 31 मार्च 2013

अवसरवाद ... भारत  भुमी को तोड्ने के लिये जितने अवसर वादी १ हजार सालो से जुटे है शायद ही दुनिया के  किसी और भाग मे मिलेन्गे पहले तो मुगलो ने मटिया मेट किया उसके बाद सन १९४७के बाद नेहरु और गान्धी ने किया , लेकिन दुख की बात है सारा दोष अन्ग्रेजो पर मढ दिया जाता है . उदाहरण देखे . यदी आप अपनी भारतिय सन्स्क्रिति कि सम्मान के लिये  सन्स्क्रित भाषा  को सविधान मे कुछ अधिकार देन्गे या हिन्दि को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये पहल करेन्गे या वन्दे मातरम गीत को गायेन्गे तो विरोध मे सबसे पहले कौन आयेगा ? दुसरा यदि आप बढती जनसन्ख्या को रोकने के लिये दो बच्चो वाली नीति बनाये तो पहला विरोध किसका होगा ? निसन्देह यहा के मुसलमान ही आयेन्गे . यहा के मुसलमानो को अपने देश से प्यार नही है उसे तो अरब देशो की गन्दगी चाटने कि आदत हो गइ है . अब यहा के हिन्दुत्व को तोडने के तरिके भी देख ले .. आर्य बाहर से आये है , यहा के एस सी और एस टी मुलनिवासि है . अब इन सालो को जिसमे नेहरु भी है . विग्यान को नहि मानता और सनातन धर्म को भी नही मानता . विग्यान कहता है कि समस्त प्राणीयो का मुल निवास आफ्रिका महाद्विप है यहा से समस्त प्राणिया जिसमे मनुष्य भी है सभी महाद्विपो मे फैले है . सनातन धर्म कहता है कि सन्सार के  सभी प्राणियो का मुल  जन्म स्थान हिमालय का क्षेत्र है यहि से सभ्यता का विकास होते कालान्तर मे सभी जगह फैल गये अब उपरोक्त दोनो मे से कोइ भी बात को माने तो बाहरी और मुल निवासी का झगडा ही समाप्त समझो . लेकिन नही अवसरवादियो को अपनी रोजी रोटी चलाने के लिये मुर्खो को मुर्ख बनाने मे ही अपनि बरकत नजर आती है . अब अवसर वाद का दुसरा उदाहरण देखिये .. जाती वाद .. जवाहर लाल नेहरु के साथ उस समय जितने भी अवसरवादी राजनितिग्य थे वो सभी इस्लामी गन्दगी से सराबोर थे उन सब को मोहम्मद के गन्दगी भारत मे  फैलाने फैलाने मे अपनी विकास नजर आयी या यु कहे कि वो मुगलो का एजेन्ट ही था जिसने यहा के सभ्यता को  छिन्न भिन्न करके इस्लाम वाद का जहर फैलाये . अब इनके फैलाये जहर मे यहा के भारतिय इस कदर उलझे कि आज तक वो अपनो से ही निपटने मे सारी उर्जा नष्ट कर रहे है . कोइ अपने को ब्र्हामण मान कर छुत फैला रहा तो कोइ अपने को महाराणा प्रताप का औलाद मान कर अपने को शुरवीर समझकर  असली दुश्मन इस्लाम से अपनी सिर छुपाये अपने ही छोटे भाइयो से आरक्षण नाम पर लडाइ लड रहा है . 

सोमवार, 11 मार्च 2013


भारत के वर्तमान परिद्रीष्य मे सनातन सभ्यता की शैली ही बदल चुकी है और भारतियो को पता ही नही चला . सबसे पहले बालिवुड को हि ले ले . ये सन्स्था अश्लिलता और भौन्डापन की परिभाषा हि बदल दिया है . अभी जो गाना बन रहा है उसमे सुफियाना शैली का अन्दाज हि निराला है , पहले का म्युजिक मे शास्त्रियता का पुट होता था और वो गीत के सहारे बालिवुड आज भी जिन्दा है . ' रवीन्द्र जैन . आर डी बर्मन , कल्यान जी आनन्द जी युशु दास किशोर कुमार‌ इन सब का मेल एक अलग रोमान्च का अनुभव कराता था . भाषा समझ मे आये ना आये लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक मे इनके गाने युरोप और पुरे दक्षीण एशियाई देशो . तथा पाकिस्तान अफगान आदि देशो मे इनका ही प्रभाव था
अब जब इन्ही सुरमयी गीत सुन कर ये अरबी म्युजिक वाले आकर्षित हुए और बालीवुड की तरफ आये तो अपने साथ अपना कचरा भी साथ लाये. बालिवुड भी सेक्युलर‌ गरीब भुखमरे की तरह इनके कचरे का उपकार मानते हुए दोनो बाहे फैला कर आत्मसात भी कर लिया .
अब इनके गानो का शैली देखे .. इनके कोई भी गानो मे इनका अल्लाह पीछा ही नही छोड्ता प्रेमिका कि पप्पी वाला गीत बस इनको इनका अल्लाह माफ करे लगभग सभी गानो मे स्त्री जाति सिर्फ भोग की वस्तु है , बस उसको चुमने चाटने के  बाद अल्लाह माफ करे . पता नही इनके मोहम्मद ने क्या गलती किया . और उस गलती को बताये बिना अल्लाह इनको माफ करे एक गीत की हि बात नही है कैसे भी काम हो अल्लाह माफ करे .
ना जाने हमारे पुराने स्वर कहा गये जब होली, दिवाली . रक्षाबन्धन . सभी त्योहारो और मौसमो का सगीत  सुनते थे अब तो बस रन्डीबाजी गाना और अल्लाह माफ करे .

रविवार, 10 मार्च 2013

* भारत के सनातन संस्कृति का होता अरबीकरण और इसके पीछे की हिन्दुओ की उदासीनता *

समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.

गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.

अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"

ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.

फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?

पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.
शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".

अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
* भारत के सनातन संस्कृति का होता अरबीकरण और इसके पीछे की हिन्दुओ की उदासीनता *

समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.

गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.

अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"

ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.

फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?

पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.
शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".

अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.
* भारत के सनातन संस्कृति का होता अरबीकरण और इसके पीछे की हिन्दुओ की उदासीनता *

समस्या अक्कल की नही है. समस्या संस्कृति की है. भारत की सनातन संस्कृति और अरबो के इस्लामी संस्कृति में कोई मेल नहीं है. किसी भी देश में दो-दो संस्कृतिया नहीं चलती. केवल भारत में ही यह प्रयत्न किया जा रहा है. बुद्धी की आवश्यकता हिन्दुओ को है. वो जितना उर्दू, इस्लाम को सम्मान देंगे उतना भी सनातन भारतीय संस्कृति दबेगी, क्युकी दो संस्कृतिया कभी भी एक घर में नहीं रहती. ऐसा एक भी देश नहीं है.

गलती हिन्दुओ से हो रही है, मुसलमान तो चतुर है, वह पूरा लाभ उठा रहा है हिन्दुओ की अज्ञानता, उदासीनता का उनके संस्कृति के प्रति और भारत की सनातन संस्कृति का अरबीकरण कर रहा है. अरबीकरण से लाखो गुना बेहतर है अंग्रेजीकरण.

अब इसपर उच्च "बुद्धिमान" लोग तर्क देते है - "यदि हमने भारत में शुद्ध हिंदी की ओर चलन आरंभ किया, तो क्या पाकिस्तान उभर नहीं जाएगा एक उर्दू के केंद्र के रूप में ?"

ऐसे तर्क केवल हारे और निराशावादी लोग देते है. अरे भाई, पाकिस्तान तो 1947 में ही उभर चूका था. अब वो उल्टा हमारा उर्दू-कारण कर रहा है बहुत तेजी से, ताकि उसकी छाप भारत के मुसलमानों और प्रदेशो पर पड़े. जिस दिन हमने स्वयम उर्दू त्याग दी व्यवहार से, भारत के मुसलमानों को भी झक मारके सनातन भाषाए अपनानी पड़ेगी, नही तो उनको व्यवहार में पीछे रहना पड़ेगा, क्युकी कोई भी समाज दो भाषाए नहीं बोलता और उस विनिमय की भाषा को निर्धारीत मूल बहुसंख्यक ही करते है.

फ्रांस इतना छोटा सा प्रदेश है, लेकिन क्या वो अपने पडोसी की भाषा अपने उपर लाद लेता है ? तो फिर भारत की बीस सनातनी भाषाये छोडकर उर्दू क्यू घुसेड़ना इतनी ? शायरी किसलिए? हिंदी कवी मर गये क्या ?

पाकिस्तन से डरने की जगह उल्टा भारत की भाषा प्रचलित करनी चाहिए. हो उल्टा रहा है - कुछ लोग पाकिस्तानियो को भारत से मिलाना चाहते है ताकि दोनों मिलकर बलात्कारी शाहजहाँ के सम्मान मे अरबो की जुतिया चाटे. इसीलिए उर्दू थोपी जा रही है भारत पर.
शाहजहाँ अपनी बेटी के साथ सोता था. इसपर लोगो के प्रश्न उठाने पर उसने कहा - "जैसे हर माली को अधिकार है उसके बगीचे में खिलने कली का मजा लेने का, वैसे ही एक पिता का पहला अधिकार है उसकी बेटी पर".

अब आप समझे की हिन्दू-समाज और हिंदुवादियो में नारियो को लेकर इतनी गंदगी और उनके मस्तिस्क में बदबू क्यू है. ये सब इस्लाम से आया है और आजकल हम इसे "ये हमारी संस्कृति है" कहते है.